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अष्टावक्र गीता • अध्याय 18 • श्लोक 1
अष्टावक्र उवाच - यस्य बोधोदये तावत्-स्वप्नवद् भवति भ्रमः। तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे॥
अष्टावक्र कहते हैं - जिस बोध का उदय होने पर, जागने पर स्वप्न के समान भ्रम की निवृत्ति हो जाती है, उस एक, सुखस्वरूप शांत प्रकाश को नमस्कार है।
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