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अष्टावक्र गीता • अध्याय 17 • श्लोक 8
कृतार्थोऽनेन ज्ञानेने-त्येवं गलितधीः कृती। पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्नस्ते यथा सुखम्॥
इस ज्ञान से कृतार्थ होकर बुद्धि को अन्तर्हित(विलीन) करके देखते हुए, सुनते हुए, स्पर्श करते हुए, सूंघते हुए और खाते हुए सुखपूर्वक रहते हैं।
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