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अष्टावक्र गीता • अध्याय 17 • श्लोक 20
मनःप्रकाशसंमोह स्वप्नजाड्यविवर्जितः। दशां कामपि संप्राप्तो भवेद् गलितमानसः॥
कोई भी मन की मोह, स्वप्न और जड़ता से रहित, प्रकाशित अवस्था को प्राप्त कर मन की इच्छाओं से रहित हो जाये।
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