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अष्टावक्र गीता • अध्याय 17 • श्लोक 18
समाधानसमाधान-हिताहितविकल्पनाः। शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः॥
संदेह और समाधान एवं हित और अहित की कल्पना से परे, शून्य चित्त वाला पुरुष कैवल्य में ही स्थित रहता है।
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