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अष्टावक्र गीता • अध्याय 17 • श्लोक 10
न जगर्ति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति। अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः॥
न जगता ही है और न सोता ही है, न ही आँखें खोलता या बंद करता है, अहा! उस परम अवस्था में कोई मुक्त चेतना वाला विरला ही रहता है।
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