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अष्टावक्र गीता • अध्याय 16 • श्लोक 5
इदं कृतमिदं नेति द्वंद्वैर्मुक्तं यदा मनः। धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत्॥
यह करना चाहिए और यह नहीं जब मन इस प्रकार के द्वंद्वों से से मुक्त हो जाता है तब उसको धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अपेक्षा (इच्छा) नहीं रहती।
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