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अष्टावक्र गीता • अध्याय 15 • श्लोक 8
श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोऽहं कुरुष्व भोः। ज्ञानस्वरूपो भगवा-नात्मा त्वं प्रकृतेः परः॥
हे प्रिय! इस अनुभव पर निष्ठा रखो, इस पर श्रद्धा रखो, इस अनुभव की सत्यता के सम्बन्ध में मोहित मत हो, तुम ज्ञान स्वरुप हो, तुम प्रकृति से परे और आत्म स्वरुप भगवान हो।
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