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अष्टावक्र गीता • अध्याय 15 • श्लोक 5
रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन। निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर॥
राग (प्रियता) और द्वेष (अप्रियता) मन के धर्म हैं और तुम किसी भी प्रकार से मन नहीं हो, तुम कामनारहित हो, ज्ञान स्वरुप हो, विकार रहित हो, अतः सुखपूर्वक रहो।
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