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अष्टावक्र गीता • अध्याय 15 • श्लोक 18
एक एव भवांभोधा-वासीदस्ति भविष्यति। न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृत्यकृत्यः सुखं चर॥
एक ही भवसागर(सत्य) था, है और रहेगा । तुममें न मोक्ष है और न बंधन, आप्त-काम होकर सुख से विचरण करो।
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