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अष्टावक्र गीता • अध्याय 15 • श्लोक 17
भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किंचिदिति निश्चयी। निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किंचिदिव शाम्यति॥
यह विश्व केवल भ्रम (स्वप्न की तरह असत्य) है और कुछ भी नहीं, ऐसा निश्चय करो। इच्छा और चेष्टा रहित हुए बिना कोई भी शांति को प्राप्त नहीं होता है।
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