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अष्टावक्र गीता • अध्याय 15 • श्लोक 13
एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि। कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहंकार एव च॥
इस अव्यय, शांत, चैतन्य, निर्मल आकाश में तुम अकेले ही हो, अतः तुममें जन्म, कर्म और अहंकार की कल्पना किस प्रकार की जा सकती है।
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