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अष्टावक्र गीता • अध्याय 15 • श्लोक 11
त्वय्यनंतमहांभोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः। उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः॥
अनंत महासमुद्र रूप तुम में लहर रूप यह विश्व स्वभाव से ही उदय और अस्त को प्राप्त होता है, इसमें तुम्हारी क्या वृद्धि या क्षति है।
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