शारीरिक दुख भी कहाँ (अर्थात नहीं) हैं, वाणी के दुख भी कहाँ हैं, वहाँ मन भी कहाँ है, सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ।
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