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अष्टावक्र गीता • अध्याय 13 • श्लोक 2
कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते। मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्
शारीरिक दुख भी कहाँ (अर्थात नहीं) हैं, वाणी के दुख भी कहाँ हैं, वहाँ मन भी कहाँ है, सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ।
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