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अष्टावक्र गीता • अध्याय 12 • श्लोक 3
समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये। एवं विलोक्य नियमं एवमेवाहमास्थितः॥
अध्यास (असत्य ज्ञान) आदि असामान्य स्थितियों और समाधि को एक नियम के समान देखते हुए मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ।
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