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अष्टावक्र गीता • अध्याय 12 • श्लोक 1
जनक उवाच - कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः। अथ चिन्तासहस्तस्माद् एवमेवाहमास्थितः॥
श्री जनक कहते हैं - पहले मैं शारीरिक कर्मों से निरपेक्ष (उदासीन) हुआ, फिर वाणी से निरपेक्ष (उदासीन) हुआ। अब चिंता से निरपेक्ष (उदासीन) होकर अपने स्वरुप में स्थित हूँ।
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