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अष्टावक्र गीता • अध्याय 11 • श्लोक 7
आब्रह्मस्तंबपर्यन्तं अहमेवेति निश्चयी। निर्विकल्पः शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः॥
तृण से लेकर ब्रह्मा तक सब कुछ मैं ही हूँ, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला विकल्प (कामना) रहित, पवित्र, शांत और प्राप्त-अप्राप्त से आसक्ति रहित हो जाता है।
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