स खल्वेवं यो विद्वान्सोपनयनादुर्ध्वमेवानि प्राग्वा त्यजेत्। पितरं पत्रमग्निमुपवीतं कर्म कलत्रं चान्यदपीह। यतयो भिक्षार्थं ग्रामं प्रविशन्ति पाणिपात्रमुदरपात्रं वा । ॐहि ॐहि ॐ हीत्येतदुपनिषदं विन्यसेत् । खल्वेतदुपनिषदं विद्वान्य एवं वेद पालाशं बैल्वमाश्वत्थमौदुम्बरं दण्डं मौञ्ज्जीं मेखलां यज्ञोपवीतं च त्यक्त्वा शूरो य एवं वेद । तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीव चक्षुराततम्। तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते विष्णोर्यत्परमं पदमिति। एवं निर्वाणानुशासनं वेदानुशासनं वेदानुशासनम्। इत्युपनिषद्॥
इसके समस्त नियम-उपनियम की पूर्ण जानकारी रखने वाला विद्वान् यदि संन्यास धर्म को ग्रहण करना चाहे, तो उसे उपनयन के पश्चात् अथवा पूर्व में भी अपने माता-पिता, पुत्र, अग्नि, उपवीत, कर्म, पत्नी अथवा अन्य और जो भी कुछ हो उन समस्त वस्तुओं-पदार्थों का त्याग कर देना चाहिए।
संन्यास धर्म ग्रहण करने वाले को चाहिए कि वह अपने हाथों को ही पात्र बना ले या फिर अपने उदर (पेट) को ही पात्र रूप में उपयोग कर भिक्षार्थ गाँव में गमन करे। ॐ हि इस उपनिषद् मन्त्र का तीन बार उच्चारण करते हुए (भिक्षार्थ गाँव में) प्रवेश करे। यह उपनिषद् है। जो (विद्वान्) इस उपनिषद् को पूर्णरूप से जानता है, वही विद्वान् है।
पलाश (छिउल), बेल, पीपल या गूलर आदि में से किसी को दण्ड, मुँज की मेखला धारण कर एवं यज्ञोपवीत आदि का परित्याग कर जो इस (उपनिषद्) को भली प्रकार जान लेता है, वही श्रेष्ठ है, यही शूरवीर है।
जो (परमात्मा) आकाश में प्रकाश युक्त सूर्य मण्डल की तरह परम व्योम में चिन्मय तेज के द्वारा सभी और संव्याप्त है, ऐसे भगवान् विष्णु के उस परमधाम का विद्वान् उपासक सदैव दर्शन करते हैं। साधना में सतत लगे रहने वाले निष्काम उपासक ब्राह्मण वहाँ पहुँच कर उस परमधाम को और भी प्रदीप्त किए रहते हैं, ऐसे उस पद को विष्णु का परमधाम कहते हैं।
इस प्रकार यह निर्वाण (मुक्ति प्राप्ति) का अनुशासन है, वेद का अनुशासन है, यही उपनिषद् है।
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