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अरुणेय • अध्याय 1 • श्लोक 4
अथातः परमहंसपरिव्राजकानामासनशयनादिकं भूमौ ब्रह्मचारिणां मृत्पात्रं वाऽलापात्रं दारुपात्रं वा। कामक्रोधहर्षरोषलोभमोहदम्भदच्छासूयाममत्वाहंकारादीनपि परित्यजेत्। वर्षासु ध्रुवशीलोऽष्टौ मासानेकाकी यतिश्चरेद् द्वावे वा चरेद् द्वावे वा चरेदिति ॥
तदनन्तर (ब्रह्माजी ने पुनः कहा) - ब्रह्मभाव को प्राप्त परमहंस परिव्राजकों के लिए पृथ्वी पर ही आसन और शयन आदि का नियम है। मिट्टी के पात्र को या फिर तूँबी अथवा काष्ठ के कमण्डलु को अपने पास रखे। संन्यासियों को काम, क्रोध, हर्ष, शोक, रोष, लोभ मोह, दम्भ, ईर्ष्या, इच्छा, परनिन्दा एवं ममता और अहंकार आदि का भी परित्याग पूर्ण रूप से कर देना चाहिए। उन्हें वर्षा ऋतु के चार माह तक एक ही स्थान पर स्थिर होकर रहना चाहिए, इसके अतिरिक्त शेष आठ माह एकाकी भ्रमण करें अथवा कम से कम दो माह तक एक ही स्थान में रहे।
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