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अमृतबिन्दु • अध्याय 1 • श्लोक 9
स्वरेण संधयेद्योगमस्वरं भावयेत्परम् । अस्वरेणानुभावेन नाभावो भाव इष्यते ॥
(साधक को) स्वर अर्थात् प्रणव के द्वारा व्यक्त ब्रह्म की अनुभूति करनी चाहिए तथा इसके पश्चात् अस्वर द्वारा (प्रणव से अतीत) अव्यक्त ब्रह्म का चिन्तन करे। प्रणवातीत उस श्रेष्ठ, परब्रह्म की प्राप्ति भावना के माध्यम से भाव-रूप में होती है, अभाव रूप में नहीं।
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