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अमृतबिन्दु • अध्याय 1 • श्लोक 6
निरस्तविषयासङ्गं संनिरुद्धं मनो हृदि । यदाऽऽयात्यात्मनो भावं तदा तत्परमं पदम् ॥
इसके अनन्तर जब मन से विषयों की आसक्ति निकल जाती है तथा वह हृदय में स्थिर होकर उन्मनी भाव को प्राप्त हो जाता है, तब वह उस परमपद को प्राप्त कर लेता है।
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