सर्वभूताधिवासं यद्भूतेषु च वसत्यपि ।
सर्वानुग्राहकत्वेन तदस्म्यहं वासुदेवः ॥
जिसमें समस्त भूत प्राणियों का निवास है, जो स्वयं भी सभी भूत प्राणियों के हृदय में स्थित है एवं सभी पर अहैतु की कृपा करने के कारण प्रसिद्ध है। वह सभी आत्माओं में स्थित वासुदेव मैं ही हूं, वह सर्वात्मा वासुदेव मैं स्वयं ही हूं। इस प्रकार यह उपनिषद् पूर्ण हुई।
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