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अमृतबिन्दु • अध्याय 1 • श्लोक 17
शब्दमायावृतो नैव तमसा याति पुष्करे । भिन्ने तमसि चैकत्वमेक एवानुपश्यति ॥
जब तक नाम-रूपात्मक अस्तित्व रखने वाली माया के द्वारा (यह) जीवात्मा आवृत रहता है, तब तक बँधे हुए की भाँति हृदय-कमल में स्थित रहता है, जब अज्ञान रूपी अन्धकार का विनाश हो जाता है, तब ज्ञान रूपी प्रकाश में विद्वान् पुरुष जीवात्मा एवं परमात्मा के एकत्व का दर्शन प्राप्त कर लेता है।
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