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अमृतबिन्दु • अध्याय 1 • श्लोक 15
घटसंवृतमाकाशं नीयमानो घटे यथा । घटो नीयेत नाकाशः तद्वज्जीवो नभोपमः ॥
घट (घड़े) में आकाश तत्त्व पूर्णरूप से विद्यमान है; किन्तु जिस प्रकार घड़े के क्षत-विक्षत होने पर मात्र घड़े का ही विनाश होता है, उसमें भरे हुए आकाश तत्त्व का नहीं, उसी प्रकार शरीर धारण करने वाला जीव भी आकाश के ही सदृश है। शरीर के विनष्ट होने से आत्मा का विनाश नहीं होता, वह शाश्वत है।
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