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अमृतबिन्दु • अध्याय 1 • श्लोक 10
तदेव निष्कलं ब्रह्म निर्विकल्पं निरञ्जनम् । तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा ब्रह्म सम्पद्यते ध्रुवम् ॥
वह ब्रह्म कलाओं से रहित (एक रस-प्राणादि कलाओं से ऊपर), निर्विकल्प एवं निरञ्जन अर्थात् माया और मल से रहित है। वह ब्रह्म मैं ही हूँ’, इस प्रकार जान करके मनुष्य निश्चित ही ब्रह्ममय हो जाता है।
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