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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 6
तावद्रथेन गन्तव्यं यावद्रथपथि स्थितः । स्थित्वा रथपथस्थानं रथमुत्सृज्य गच्छति ॥
उस (प्रणवरूपी) रथ के द्वारा तब तक चलना चाहिए, जब तक कि रथ द्वारा चलने योग्य मार्ग पूर्ण न हो जाये। जब वह मार्ग (लक्ष्य) पूर्ण हो जाता है, तब उस रथ को छोड़ कर मनुष्य स्वतः ही प्रस्थान कर जाता है।
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