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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 5
ओङ्कारं रथमारुह्य विष्णुं कृत्वाथ सारथिम् । ब्रह्मलोकपदान्वेषी रुद्राराधनतत्परः ॥
ॐकार रूपी रथ में आरूढ़ होकर तथा भगवान् विष्णु को अपना सारथि बनाकर ब्रह्मलोक के परमपद का चिन्तन करता हुआ ज्ञानी पुरुष देवाधिदेव भगवान् रुद्र की उपासना में तल्लीन रहे।
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