यस्येदं मण्डलं भित्वा मारुतो याति मूर्धनि ।
यत्र तत्र म्रियेद्वापि न स भूयोऽबिजायते ।
न स भूयोऽभिजायत इत्युपनिषत् ॥
जिस श्रेष्ठ योगी अथवा साधक का प्राण इस मण्डल (पञ्चतत्त्वात्मक शरीर-क्षेत्र, वायु स्थान एवं हृदय प्रदेश) का बेधन कर मस्तिष्क के क्षेत्र में प्रविष्ट कर जाता है, वह अपने शरीर का जहाँ कहीं भी परित्याग करे, पुनः जन्म नहीं लेता अर्थात् जन्म-मरण के चक्र से मुक्त जाता है, यही उपनिषद् है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अमृतनाद के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।