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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 41
समानस्तु द्वयोर्मध्ये गोक्षीरधवलप्रभः । आपाण्डर उदानश्च व्यानो ह्यर्चिस्समप्रभः ॥
नाभि के मध्य क्षेत्र में समान वायु स्थिर है। यह गो-दुग्ध या स्फटिक मणि की भाँति शुभ्र कान्तियुक्त है। उदान वायु का रंग धूसर अर्थात् मटमैला है और व्यान वायु का रंग अग्निशिखा की भाँति तेजस्वी है।
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