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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 40
रक्तवर्नो मणिप्रख्यः प्राणो वायुः प्रकीर्तितः । अपानस्तस्य मध्ये तु इन्द्रगोपसमप्रभः ॥
इस प्राण वायु को लाल रंग की मणि के सदृश लोहित वर्ण की संज्ञा प्रदान की गई है। अपान वायु को गुदा ‘के बीचो बीच इन्द्रगोप-बीर बहूटी नामक गहरे लाल (रंग वाले एक बरसाती कीड़े के) रंग का माना गया है।
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