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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 4
शास्त्राण्यधीत्य मेधावी अभ्यस्य च पुनः पुनः । परमं ब्रह्म विज्ञाय उल्कावत्तान्यथोत्सृजेत् ॥
परम ज्ञानवान् मनुष्य का यह कर्तव्य है कि वह शास्त्रादि का अध्ययन करके बारम्बार उनका अभ्यास करते हुए ब्रह्म विद्या की प्राप्ति करे। विद्युत् की कान्ति के समान क्षण भंगुर इस जीवन को (आलस्य प्रमाद में) नष्ट न करे।
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