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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 39
व्यानः सर्वेषु चाङ्गेषु सदा व्यावृत्य तिष्ठति । अथ वर्णास्तु पञ्चानां प्राणादीनामनुक्रमात् ॥
व्यान समस्त अङ्ग-प्रत्यङ्गों में व्यापक होकर सदैव प्रतिष्ठित रहता है। अब इसके पश्चात् समस्त प्राण आदि पाँचों वायुओं के रंग का क्रमानुसार वर्णन किया जाता है।
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