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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 33
चतुर्भिः पश्यते देवान्पञ्चभिस्तुल्यविक्रमः । इच्छयाप्नोति कैवल्यं षष्ठे मासि न संशयः ॥
वह योगी-साधक नित्य – नियमित अभ्यास करता हुआ चार मास में ही देव दर्शन की सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है। पाँच माह में देव-गणों के समान शक्ति सामर्थ्य से युक्त हो जाता है तथा छ: मास में अपनी इच्छानुसार निःसन्देह कैवल्य को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है।
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