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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 32
अनेन विधिना सम्यङ्नित्यमभ्यसतः क्रमात् । स्वयमुत्पद्यते ज्ञानं त्रिभिर्मासैर्न संशयः ॥
इस प्रकार नियम पूर्वक जो भी साधक क्रमशः उत्तरोत्तर प्रगति करता हुआ नियमित अभ्यास करता है, उसे तीन मास में ही स्वयमेव ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
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