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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 31
भयं क्रोधमथालस्यमतिस्वप्नातिजागरम् । अत्याहरमनाहरं नित्यं योगी विवर्जयेत् ॥
भय, क्रोध, आलस्य, अधिक शयन, अत्यधिक जागरण करना, अधिक भोजन करना या फिर बिल्कुल निराहार रहना आदि समस्त दुर्गुणों को योगी सदैव के लिए परित्याग कर दे।
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