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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 30
हृद्द्वारं वायुद्वारं च मूर्धद्वारमतः परम् । मोक्षद्वारं बिलं चैव सुषिरं मण्डलं विदुः ॥
वायु के प्रवेश का मार्ग हृदय ही है। इससे ही प्राण सुषुम्णा के मार्ग में प्रवेश करता है। इससे ऊपर ऊर्ध्वगमन करने पर सबसे ऊपर मोक्ष का द्वार ब्रह्मरन्ध्र है। योगी लोग इसे सूर्यमण्डल के रूप में जानते हैं। | इसी सूर्यमण्डल अथवा ब्रह्मरन्ध्र का बेधन करके प्राण का परित्याग करने से मुक्ति प्राप्त होती है।
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