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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 29
येनासौ पश्यते मार्गं प्राणस्तेन हि गच्छति । अतस्तमभ्यसेन्नित्यं सन्मार्गगमनाय वै ॥
योगी पुरुष जिस मार्ग का अवलोकन करता है अर्थात् मन के माध्यम से जिस स्थान को प्रवेश करने योग्य मानता है, उसी मार्ग प्राण और मन के साथ गमन कर जाता है। प्राण श्रेष्ठ मार्ग से गमन करे, इस हेतु साधक को नित्यनियमित अभ्यास करते रहना चाहिए।
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