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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 28
अघोषमव्यञ्जनमस्वरं च अकण्ठताल्वोष्ठमनासिकं च । अरेफजातमुभयोष्मवर्जितं यदक्षरं न क्षरते कदाचित्॥
इस प्रणव नाम से प्रसिद्ध घोष का उच्चारण बाह्य प्रयत्नों से नहीं होता है। यह व्यञ्जन एवं स्वर भी नहीं है। इसका उच्चारण कण्ठ, तालु, ओष्ठ एवं नासिका आदि से भी नहीं होता। इसका दोनों ओष्ठों के अन्त में स्थित दन्त नामक क्षेत्र से भी उच्चारण नहीं होता। ‘प्रणव‘ वह श्रेष्ठ अक्षर है, जो कभी भी च्युत नहीं होता। ओंकार का प्राणायाम के रूप में अभ्यास करना चाहिए तथा मन गुञ्जायमान घोष में सदैव लगाए रहना चाहिए।
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