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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 26
तिर्यगूर्ध्वमधो दृष्टिं विहाय च महामतिः । स्थिरस्थायी विनिष्कम्पः सदा योगं समभ्यसेत् ॥
अपनी दृष्टि को ऊपर अथवा नीचे की ओर तिरछा घुमाकर केन्द्रित करते हुए बुद्धिमान् साधक स्थिरता पूर्वक निष्कम्प भाव से स्थित होकर योग का अभ्यास करे।
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