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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 25
पश्चाद्ध्यायीत पूर्वोक्तक्रमशो मन्त्रविद्बुधः । स्थूलातिस्थूलमात्रायं नाभेरूर्ध्वरुपक्रमः ॥
इस प्रकार प्राणायाम के द्वारा सभी दोषों का शमन करते हुए पूर्व निर्दिष्ट क्रम के अनुसार ‘ओंकार‘ का ध्यान करते हुए प्राणायाम करे। इस तरह का ‘प्रणव गर्भ‘ प्राणायाम नाभि के ऊर्ध्व भाग अर्थात् हृदय में ध्यान करते हुए स्थूलातिस्थूल मात्रा में सम्पन्न करे।
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