वह शब्द रूप एकाक्षर प्रणव (ॐ) ही ब्रह्म है। तदनन्तर इसी एकाक्षर ब्रह्म ॐकार का ही ध्यान करता हुआ रेचक क्रिया सम्पन्न करे अर्थात् वायु का शनैः-शनैः निष्कासन करे। इस तरह से कई बार इस ‘ओंकार‘ रूपी दिव्य मन्त्र से (प्राणायाम की क्रिया द्वारा) अपने चित्त के मल को दूर करना चाहिए।
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