ऊहा अर्थात् विचार करना ‘तर्क‘ कहा जाता है। ऐसे ‘तर्क‘ को प्राप्त करके दूसरे अन्य सभी प्राप्त होने वाले पदार्थों को तुच्छ (निकृष्ट) मान लिया जाता है। इस प्रकार की स्थिति को ही ‘समाधि‘ की अवस्था कहा जाता है।
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