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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 19
मनः सङ्कल्पकं ध्यात्वा संक्षिप्यात्मनि बुद्धिमान् । धारयित्वा तथाऽऽत्मानं धारणा परिकीर्तिता ॥
बुद्धिमान् मनुष्य मन को संकल्प के रूप में जानकर, उसे आत्मा (बुद्धि) में लय कर दे। तत्पश्चात् उस आत्मारूपी सद्बुद्धि को भी परमात्म सत्ता के ध्यान में स्थिर कर दे। इस तरह की क्रिया को ही धारणा की स्थिति के रूप में जाना जाता है।
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