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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 15
उत्क्षिप्य वायुमाकाशं शून्यं कृत्वा निरात्मकम् । शून्यभावेन युञ्जीयाद्रेचकस्येति लक्षणम् ॥
(नासिका द्वारा) प्राणवायु को आकाश में निकालकर हृदय को वायु से रहित एवं चिन्तन से रिक्त करते हुए शून्यभाव में मन को स्थिर करने की प्रक्रिया ही ‘रेचक‘ है। यही ‘रेचक प्राणायाम‘ का लक्षण है।
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