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अमृतनाद • अध्याय 1 • श्लोक 13
रुचिरं रेचकं चैव वायोराकर्षणं तथा । प्राणायामस्त्रयः प्रोक्ता रेचपूरककुम्भकाः ॥
इस प्रकार अपने इष्ट के सुन्दर रूप का ध्यान करते हुए वायु को अन्त:करण में स्थिर रखना, श्वास को निःसृत करना और वायु को अन्दर खींचना । इस प्रकार रेचक, पूरक एवं अन्त:- बाह्य कुम्भक के रूप में तीन तरह के प्राणायाम कहे गये हैं।
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