यहाँ ऋषि कहते हैं—
“मैं गर्भ में स्थित रहते हुए ही समस्त देवताओं की उत्पत्तियों को जान गया। सौ लोहे के नगर भी मेरी रक्षा नहीं कर सके, और मैं तेज गति से श्येन (बाज़) की भाँति वहाँ से निकल आया।”
यह वचन वास्तव में गर्भ में स्थित वामदेव ऋषि का अनुभव बताया गया है, जिसने इस प्रकार आत्मज्ञान की स्थिति का वर्णन किया।
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