मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
ऐतरेय • अध्याय 4 • श्लोक 5
तदुक्तमृषिणा गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा शतं मा पुर आयसीररक्शन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति। गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच ॥
यहाँ ऋषि कहते हैं— “मैं गर्भ में स्थित रहते हुए ही समस्त देवताओं की उत्पत्तियों को जान गया। सौ लोहे के नगर भी मेरी रक्षा नहीं कर सके, और मैं तेज गति से श्येन (बाज़) की भाँति वहाँ से निकल आया।” यह वचन वास्तव में गर्भ में स्थित वामदेव ऋषि का अनुभव बताया गया है, जिसने इस प्रकार आत्मज्ञान की स्थिति का वर्णन किया।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
ऐतरेय के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

ऐतरेय के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें