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ऐतरेय • अध्याय 4 • श्लोक 2
तत्स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति यथा स्वमङ्गं तथा। तस्मादेनां न हिनस्ति। साऽस्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति ॥
वह (वीर्य/जीव) स्त्री में पहुँचकर उसके साथ एकात्म हो जाता है, जैसे किसी का अपना अंग होता है। इसलिए वह उसे (स्त्री को) हानि नहीं पहुँचाता। वह (स्त्री) इस उसमें प्रविष्ट आत्मा का पालन-पोषण करती है।
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