वह (वीर्य/जीव) स्त्री में पहुँचकर उसके साथ एकात्म हो जाता है, जैसे किसी का अपना अंग होता है। इसलिए वह उसे (स्त्री को) हानि नहीं पहुँचाता।
वह (स्त्री) इस उसमें प्रविष्ट आत्मा का पालन-पोषण करती है।
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