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ऐतरेय • अध्याय 2 • श्लोक 4
अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वा अक्षिणी प्राविशाद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचंप्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन्‌ ॥
- अग्नि वाणी बनकर मुख में प्रवेश कर गई। - वायु प्राण बनकर नाक में प्रवेश कर गया। - सूर्य दृष्टि बनकर आँखों में प्रवेश कर गया। - दिशाएँ श्रवण शक्ति बनकर कानों में प्रवेश कर गईं। - वनस्पतियाँ बाल बनकर त्वचा में प्रवेश कर गईं। - चन्द्रमा मन बनकर हृदय में प्रवेश कर गया। - मृत्यु अपान वायु बनकर नाभि में प्रवेश कर गई।
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