उस पुरुष की तपस्या से जब देवताओं का पुनः नियोजन हुआ, तब—
अग्नि वाणी बनकर मुख में प्रविष्ट हुआ।
वायु प्राण बनकर नासिका में प्रविष्ट हुआ।
आदित्य चक्षु बनकर नेत्रों में प्रविष्ट हुआ।
दिशाएँ श्रोत्र बनकर कानों में प्रविष्ट हुईं।
औषधि और वनस्पति रोम बनकर त्वचा में प्रविष्ट हुए।
चन्द्रमा मन बनकर हृदय में प्रविष्ट हुआ।
मृत्यु अपान बनकर नाभि में प्रविष्ट हुआ।
जल रेतस् बनकर लिंग में प्रविष्ट हुआ।
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