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ऐतरेय • अध्याय 2 • श्लोक 1
ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतंस्तमशनापिपासाभ्यामन्ववार्जत्‌। ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥
वे देवता जो इस प्रकार उत्पन्न हुए थे, वे उस महान् अर्णव (सृष्टि-समुद्र) में गिर पड़े और भूख तथा प्यास से पीड़ित हो गए। तब उन्होंने उस (पुरुष/प्रजापति) से कहा— “हमारे लिए कोई ऐसा आश्रय बताइए जिसमें हम स्थित होकर अन्न का भोग कर सकें।”
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