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अद्वयतारक • अध्याय 1 • श्लोक 5
अद्वयतारकपदार्थों गर्भजन्मजरामरणभयात्संतारयति तस्मात्तारकमिति । जीवेश्वरौ मायिकाविति विज्ञाय सर्वविशेषं नेति नेतीति विहाय यदवशिष्यते ततद्वयं ब्रह्म ॥
जो (तेजोमय परब्रह्म) गर्भ, जन्म, जरा, मरण एवं संहार आदि पापों से तारता है अर्थात् मुक्ति दिला देता है, उसे ‘तारक’ ब्रह्म कहा गया है। जीव एवं ईश्वर को मायिक (माया से आवृत्) जानते हुए अन्य सभी को ‘नेति-नेति’ कहते हुए छोड़कर जो कुछ शेष बचा रहता है, वही ‘अद्वय ब्रह्म’ कहा गया है।
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