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अद्वयतारक • अध्याय 1 • श्लोक 4
चित्स्वरूपोऽहमिति सदा भवयन् सम्यनिमीलिताक्षः किञ्चिदुन्मीलिताक्षो वाऽन्तर्दृष्ट्या भ्रूदहरादुपरि सच्चिदानन्दतेजःकूटरूपं परं ब्रह्मावलोकयन् तद्रूपो भवति ॥
वह नेत्रों को बन्द अथवा अधखुले रखकर अन्त:दृष्टि से भृकुटी के ऊर्ध्व स्थल में ‘मैं चित स्वरूप हूँ।’ इस प्रकार का भाव चिन्तन करते हुए सच्चिदानन्द के तेज से युक्त कूटरूप (निश्चल) ब्रह्म का दर्शन करता हुआ ब्रह्ममय ही हो जाता है।
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